TMKOC: जेठालाल को मिले बबीता के बंगाली रसगुले

दोस्तों, यह मेरी पहली कहानी “Jethalal Tastes Babita’s Bengali Booty” का देसी ट्रांसलेशन है। उम्मीद है आपको ये अंदाज पसंद आएगा

गोकुलधाम की गली में बड़े-बुज़ुर्ग से लेकर बच्चों तक सबको लगता था कि जेठालाल और बबीता बस अच्छे दोस्त हैं। कोई कहता, “अरे छोड़ो यार, ये दोनों तो वैसे ही हँस-हँस के बात करते हैं!” लेकिन हकीकत कुछ और थी, दिलों में आग तो पुरानी थी, बस ऊपर से ठंडी मुस्कानें थी। इय्यर भी बेखबर—बीवी के दिल की डोर किसी और के हाथ में है, उसका क्या पता! जेठा हर रोज़ अपनी दुकान पर बैठा यही सोचता रहता—”भाई, आज मौका कब मिलेगा? बबीता की मुस्कान जब भी देखता हूँ, दुनिया की सारी मुश्किलें भूल जाता हूँ!”

एक दिन किस्मत ने वो मौका दे ही दिया। इय्यर ऑफिस के बहाने शहर से बाहर, और बबीता अकेली। जेठा के मन में लड्डू नहीं, सीधे बंगाली रसगुल्ले फूट रहे थे! उसने झट से फोन मिलाया, “बबीता जी, सुनिए न, आज आपके घर के छोटे-मोटे काम कर दूँ? दुकान से जल्दी फ्री हूँ, वैसे भी कुछ टाइम से आप भी थकी-थकी लग रही हैं।” बबीता भी दिल ही दिल में मुस्कुराई—सोचा, “कहीं आज जेठा सच में कुछ नया न कर बैठे!”

शाम ढली, सूरज लाल था और जेठा के मन में भी लालसा थी। बालों में थोड़ा सा तेल, रंगीन कुर्ता, और उस दिन तो पाँव में जूती भी पॉलिश करा ली थी। दरवाजे पर पहुंचा, घंटी बजाई। अंदर से आई बबीता—साड़ी में, खुले बाल, कानों में झुमके, होठों पर हल्की लाली। जेठा की सांसें रुक गईं, बोला, “क्या बात है, आज तो बबीता जी एकदम हीरोइन लग रही हो!”

बबीता खिलखिलाकर बोली, “आओ न जेठा जी, बाहर क्यों खड़े हो! डर रहे हो क्या?” जेठा बोला, “डर तो सिर्फ इय्यर का रहता है, बाकी तो सब चलता है।”

अंदर घुसते ही सोफे पर जम गए। बबीता ने चाय बनाई—अदरक की खुशबू, ऊपर से हल्का इलायची का टेस्ट। “वाह, बबीता जी! ये तो एकदम दुकान वाली स्पेशल चाय है।” बबीता बोली, “आज दुकान की नहीं, घर की रेसिपी है। वैसे बताओ, आज क्या खास काम था?” जेठा थोड़ा झिझका, फिर बोला, “बात ये है, बबीता जी… कई बार सोचा आपसे कहूं… मेरे मन में आपके लिए कुछ और ही फीलिंग्स हैं।” बबीता ने चाय की प्याली हाथ में ली, मुस्कराई, बोली, “ओह, जेठा जी! मुझे तो लगा आप बस इय्यर के दोस्त हो।”

जेठा ने दिल खोल ही दिया, “नहीं बबीता जी, आपकी हँसी, आपकी बातें—सब कुछ अलग सा असर करता है मुझपे।”

थोड़ी देर ऐसे ही बातें चलीं। अब काम करने का बहाना लेकर दोनों घर के कोने-कोने में घूम रहे थे—कभी बर्तन धोना, कभी पर्दे झाड़ना, कभी फोटो फ्रेम को सीधा करना। “जेठा जी, आज बड़े सज-धज के आए हो।” “अरे बबीता जी, ये गोकुलधाम का ब्रांड लुक है। और क्या, मेरा भी स्टाइल है!” “हम्म… वैसे स्टाइल अच्छा है। पर कपड़े धोते समय पसीना भी बहा लेते हो?”

तभी सफाई करते-करते बबीता का पैर फिसल गया—सीधा सोफे पे गिरी। ब्लाउज का बटन खुला, काला ब्रा झलक गई। जेठा की आंखें चमक उठीं, बोला, “अरे बबीता जी, गोकुलधाम में CCTV तो नहीं लगा?” दोनों हँस पड़े—पर माहौल में हल्की सी शर्म, और तेज़ी से धड़कता दिल था।

जेठा ने धीरे-धीरे हाथ बढ़ाया—बटन लगाने में मदद करने लगा। हाथ लगते ही बबीता की सांसें रुक गईं, उसके गाल सुर्ख हो गए। “माफ कीजिए, गलती से छू गया।” “कोई बात नहीं, जेठा जी। कभी-कभी गलती भी प्यारी लगती है…”

अब दोनों की आँखों में मस्ती और होंठों पे शरारत थी। सफाई का बहाना छोड़, अब मूवी देखने बैठ गए। “आज कोई रोमांटिक मूवी लगाओ, जेठा जी।” “लो जी, ये रहा Netflix—कौन सी लगाऊँ, ‘दिलवाले’ या ‘लस्ट स्टोरीज’?” “हाहाहा, चलो कुछ बोल्ड ही लगा दो!”

मूवी चालू हुई, पर असली रोमांस तो रियल लाइफ में था। स्क्रीन पर कुछ भी चले, दोनों एक-दूसरे की तरफ ही बार-बार देख रहे थे। बीच में बबीता ने जेठा की जांघ पर हाथ रख दिया, बोली, “जेठा जी, बातें आँखों से भी होती हैं… बोलना जरूरी नहीं!” जेठा धीरे-धीरे उसका हाथ पकड़ता है, “बबीता जी, आज तो जी चाहता है सारे शिकवे-शिकायतें यहीं मिटा दूं…”

फिर, बिना कुछ बोले, दोनों के होंठ मिल जाते हैं। साँसों की गर्मी बढ़ जाती है। जेठा का हाथ बबीता की कमर पर, बबीता की उंगलियाँ जेठा की पीठ पर। साड़ी की एक-एक प्लीट खुलती जाती है, ब्लाउज की हुक भी सरक जाती है। “क्या माल हो बबीता जी, आज तो बंगाली रसगुल्ला लग रही हो!” “और जेठा जी, आज आपके बिना कोई रसगुल्ला खाने वाला भी नहीं है!”

धीरे-धीरे जेठा ने बबीता की ब्रा उतार दी— अपने होंठों से उसकी छाती पर प्यार की बारिश कर दी। बबीता का शरीर सिहर उठा, “ओह जेठा जी, ऐसे ही… और करो…”

फिर जेठा नीचे गया, पेट पर किस किया, फिर साड़ी खींच के पैंटी उतार दी। बबीता की साँसें तेज़ हो रही थीं। जेठा अपने होंठ, अपनी जीभ से उसका रस चखने लगा— “बंगाली रसगुल्ले का असली स्वाद तो आज मिला, बबीता जी!”

कमरा अब सिर्फ सांसों और आहों से गूंज रहा था। बबीता भी अब पूरी तरह पिघल चुकी थी। उसने जेठा को अपनी बाहों में भर लिया, और चाहत की हदें पार हो गईं।

अब असली खेल शुरू— जेठा ने अपने कपड़े उतारे, औजार को बाहर निकाला, और बबीता के ऊपर लेट गया। धीरे-धीरे औजार अंदर गया— “ओह जेठा जी, आज तो आप वाकई भारी पड़ रहे हो!” जेठा ने धीरे-धीरे चालू किया, पर जल्द ही रफ्तार पकड़ ली। कमरा दोनों की आवाज़ों से भर गया— “हां, जोर से, और जोर से!”

कुछ देर बाद, दोनों थक-हारकर पसीने से लथपथ, एक-दूसरे की बाँहों में थे। सारी चाहत, सारा रोमांच अब बस ठंडी सांसों में बदल चुका था।

चुप्पी के बीच बबीता बोली, “अगर किसी को पता चल गया तो?” जेठा ने माथे पर किस करते हुए कहा, “अरे बबीता जी, कोई देख नहीं रहा। गोकुलधाम में सब अपने-अपने में मस्त हैं।”

अब दोनों को पहली बार लगा, जैसे सच में एक-दूसरे के लिए बने हैं।

फिर, थोड़ी देर की खामोशी के बाद जेठा बोला, “अब तो तुम मेरी हो, बबीता जी… चलो, अपना-अपना दिल साफ कर दें।” बबीता ने मुस्कुरा कर कहा, “जेठा जी, आपके बिना अब जीना मुश्किल है।”

दोस्तों, अगर आपको ये कहानी पसंद आई हो, तो अपने कमेंट्स जरूर दें! और बताइए कि आगे किस टॉपिक या किरदार की कहानी पढ़ना चाहते हैं। मेरी अगली कहानियों के लिए पेज चेक करते रहें—आपके सुझाव और प्यार का इंतज़ार रहेगा!

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